Friday, 2 October 2026

 

દોહા અને તેનો ભાવાર્થ (हिन्दी भाषा में)

૧. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।

    पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥

  • ભાવાર્થ  :

    कबीरदास जी कहते हैं कि केवल धन-दौलत या पद-प्रतिष्ठा में बड़ा हो जाने से कोई महान नहीं बन जाता। जैसे खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, किंतु न तो वह थके हुए राही (मुसाफिर) को छाया दे पाता है और उसके फल भी इतनी दूर लगते हैं कि किसी की भूख सहजता से नहीं मिटती। मनुष्य की महत्ता दूसरों के काम आने और परोपकार करने में ही है।

૨.  साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

    सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ॥

  • ભાવાર્થ  :

    कबीरदास जी कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति का स्वभाव सूप (अनाज फटकने वाले छाज) जैसा होना चाहिए। जिस प्रकार सूप अनाज के अच्छे और सारयुक्त दानों को अपने पास रख लेता है और व्यर्थ के कचरे (भूसे) को उड़ा देता है; उसी प्रकार सज्जन पुरुष संसार से केवल अच्छाइयों और ज्ञान को ग्रहण करते हैं तथा बुराइयों को त्याग देते हैं।

૩.   माखी गुड़ में गड़ि रहे, पंख रह्यो लिपटाय।

      हाथ मले और सिर धुने, लालच बुरी बलाय ॥

  • ભાવાર્થ :

    मक्खी मीठे के लालच में आकर गुड़ पर बैठ तो जाती है, परंतु उसके पंख गुड़ में चिपक जाते हैं। जब वह उड़ नहीं पाती तो पछतावे में हाथ मलती है और सिर धुनती है। इसलिए कबीर जी कहते हैं कि लालच बहुत बुरी बला (आफत) है, जो मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती है।

૪.  तुलसी इस संसार में, भाँति-भाँति के लोग।

     सबसे हिल-मिल चालिए, नदी-नाव संजोग ॥

  • ભાવાર્થ (भावार्थ) :

    तुलसीदास जी कहते हैं कि इस संसार में विभिन्न स्वभाव, विचार और प्रकृति के लोग रहते हैं। हमें सभी के साथ तालमेल बिठाकर और मिल-जुलकर प्रेमपूर्वक रहना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे नदी और नाव का अल्पकालीन संयोग होता है और वे एक-दूसरे के सहयोग से पार उतर जाते हैं।

૫.  तुलसी हाय गरीब की, कबहूँ न खाली जाय।

     मुए ढोर के चाम से, लौह भस्म हो जाय ॥

  • ભાવાર્થ (भावार्थ) :

    तुलसीदास जी सावधान करते हैं कि किसी असहाय या निर्बल व्यक्ति को कभी सताना नहीं चाहिए, क्योंकि गरीब की निकली हुई आह (बद्दुआ) कभी निष्फल नहीं जाती। जिस प्रकार मरे हुए पशु के चमड़े से बनी लोहार की धौंकनी से कठोर लोहा भी जलकर राख (भस्म) हो जाता है, उसी प्रकार सताए हुए गरीब की हाय अनिष्टकारी होती है।

૬.  रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।

     टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय ॥

  • ભાવાર્થ :

    रहीम जी कहते हैं कि प्रेम और विश्वास का संबंध अत्यंत नाजुक होता है, इसे क्रोध या जल्दबाजी में झटके से नहीं तोड़ना चाहिए। यदि प्रेम का धागा एक बार टूट जाए, तो वह दोबारा पहले जैसा नहीं जुड़ता; और यदि जुड़ भी जाए तो संबंधों के बीच एक दरार या गाँठ (मनमुटाव) हमेशा के लिए बनी रह जाती है।

૭.  तरुवर फल नहि खात हैं, सरवर पियहिं न पानि।

     कहि 'रहीम' परकाज हित, संपत्ति संचहि सुजानि ॥

  • ભાવાર્થ :

    वृक्ष कभी अपने फल स्वयं नहीं खाते और सरोवर कभी अपना जल खुद नहीं पीते; वे सदा दूसरों के लिए समर्पित रहते हैं। इसी प्रकार ज्ञानी और सज्जन पुरुष जो धन-संपत्ति का संचय (संग्रह) करते हैं, वह अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई और परोपकार के लिए करते हैं।

૮.  रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।

     जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि ॥

  • ભાવાર્થ 

    रहीम जी कहते हैं कि किसी बड़े, अमीर या प्रभावशाली व्यक्ति को देखकर छोटे, साधारण या निर्धन व्यक्ति की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। संसार में हर छोटी-बड़ी वस्तु का अपना अलग महत्त्व होता है। जहाँ कपड़े सिलने के लिए छोटी-सी सुई काम आती है, वहाँ विशाल और तीक्ष्ण तलवार कोई काम नहीं कर सकती।

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